ख़्वाजा है हमारा, ख़्वाजा है हमारा
दीवाने मोहब्बत से लगाते हैं ये नारा,
ख़्वाजा है हमारा, ख़्वाजा है हमारा।
देता है जो ज़हरा के दुलारों का उतारा,
ख़्वाजा है हमारा, ख़्वाजा है हमारा।
बोलो बोलो वो, ख़्वाजा का दरबार।
मुश्किल में ग़ुलामों ने उन्हें जब भी पुकारा,
अजमेर से देने वो चले आए सहारा।
बहता है जहाँ रहमत ओ अनवार का धारा,
करवाए जो अजमेर से तैयबा का नज़ारा।
ख़्वाजा है हमारा, ख़्वाजा है हमारा।
बोलो बोलो वो, ख़्वाजा का दरबार।
चौहान ने तालाब पे जब पहरा लगाया,
पानी न मिलेगा यही ऐलान कराया।
ये सुनते ही ख़्वाजा का करम जोश में आया,
और पानी कटोरे में भरा करके इशारा।
ख़्वाजा है हमारा, ख़्वाजा है हमारा।
बोलो बोलो वो, ख़्वाजा का दरबार।
काफ़िर को यहाँ जिसने मुसलमान किया है,
वो सरवर-ए-आलम की अताओं से मिला है।
दिल मेरा भी उस मर्द-ए-मुजाहिद पे फ़िदा है,
वो शेर-ए-ख़ुदा, फ़ातिमा ज़हरा का दुलारा।
ख़्वाजा है हमारा, ख़्वाजा है हमारा।
बोलो बोलो वो, ख़्वाजा का दरबार।
तारीख़-ए-मदीना में पढ़ा है यही हमने,
भेजा था मदीने से उसे शाह-ए-उमम ने।
बख़्शा है हमें ऐसा वली रब के करम ने,
जो दूर करे ज़ुल्म ओ सितम करके इशारा।
ख़्वाजा है हमारा, ख़्वाजा है हमारा।
बोलो बोलो वो, ख़्वाजा का दरबार।
वो ऊँट बिठा दे तो उठा पाओ न तुम लोग,
फिर कैसे भला हमको भगा पाओगे तुम लोग।
हमसे जो अगर उलझे तो पछताओगे तुम लोग,
हम आशिक़-ए-ख़्वाजा हैं, ये भारत है हमारा।
ख़्वाजा है हमारा, ख़्वाजा है हमारा।
बोलो बोलो वो, ख़्वाजा का दरबार।
मैं शहर-ए-मदीना के गदाओं का गदा हूँ,
और अज़मत-ए-सरकार-ए-दो आलम पे फ़िदा हूँ।
मैं ग़ौस ओ रज़ा, ख़्वाजा के टुकड़ों पे पला हूँ,
क़िस्मत का मेरी इसलिए रोशन है सितारा।
ख़्वाजा है हमारा, ख़्वाजा है हमारा।
बोलो बोलो वो, ख़्वाजा का दरबार।
चंपा न बनेगा कोई, अंबर न बनेगा,
गर बन भी गया तो वो बराबर न बनेगा।
उस जैसा कोई हिंद का रहबर न बनेगा,
दीवाना नईम उसका, ये संसार है सारा।
ख़्वाजा है हमारा, ख़्वाजा है हमारा।
बोलो बोलो वो, ख़्वाजा का दरबार।
Comments
Post a Comment